महिला ,मंदिर और पूजा : असामनता से समानता तक

By: Deepa, 2016-04-09 11:30:00.0Category:  जागरूकता
News Image

नवरात्री के शुभ  अवसर पर महिलायों ने  शनि शिंगुरापुर मंदिर में प्रवेश कर  400 साल पुरानी परंपरा को तोड़के  एक नए बदलाव की शुरआत की है उन्हें भी पुरुषों की तरह मंदिर के चबूतरे पे जाके पूजा करने की आज्ञा देके मंदिर ने नया इतिहास लिखा है इसमें भूमाता ब्रिगेड का प्रयास सराहनीय है I ईश्वर की पूजा में इस तरह का भेदभाव किसी भी तरह स्वागत योग्य नहीं है I 
 
अगर हम प्राचीन भारत की बात करें तो महिलायों का बहुत महत्वपूर्ण स्थान समाज और परिवार में होता था| वैदिक समाज में महिलाएं समस्त धार्मिक कर्मकांडो में भाग लेती थी उन्हें अपना वर खुद चुनने का अधिकार प्राप्त था, परिवार में समस्त कार्यों में उन्हें बराबर का अधिकार प्राप्त था I 

जैसे जैसे समय बीता महिलाएं का प्रभाव धूमिल होने लगा उनका राजनीतिक शक्ति छीन ली गई, बाल  विवाह की शुरआत हो गई "एतरेय ब्राह्मण " के अनुसार लड़की सारे दुखों का स्रोत है| स्मृति युग के समय महिलायों को शूद्रों के सामान बताया गया इन्हे वेद को पढ़ने, मंत्रो को बोलने इत्यादि की मनाही थी यदयपि उन्हें काम करने, विधवा विवाह और तलाक लेने का हक़ था I

                       

महिलायों को सभी तरह की संपत्ति से वंचित रखा जाता था बल्कि उन्हें खुद संपत्ति मन जाता था, यद्यपि स्त्री धन का चलन था लेकिन वो नाम मात्र का होता था I शिक्षा का अधिकार केवल अग्रवर्ण की महिलायों को होता था I  धार्मिक स्वंत्रता का अधिकार भी ऊँचे कुल की महिलाओं  को ही मिलता था उन्हें संगीत,  नृत्य और अन्य कलाओं को सीखने का अधिकार था I

दक्षिण भारत के बात करें तोह महिलायों को धार्मिक स्वंत्रता थी ऐसे कई उदहारण मिलते है जिसमे महिलायों ने मंदिर  का निर्माण करवाया, एक ऐसे ही बोथपुर शिलालेख में वर्णन मिलता है कि रानी कुप्पाम्बिका ने अपने बीमार पति के नाम पर मंदिर बनवाया और उसमे शिवलिंग की स्थापना की I इसी तरह एक दूसरे शिलालेख के अनुसार पअनम्बिका ने अपने पति मनुकोटा की शिवलोक की प्राप्ति की इच्छा के लिए शिवमंदिर का निर्माण कराया I 
इसके अलावा नीचे स्तर पर  मंदिरों की साफ़ सफाई, संगीत, मंदिर का रखरखाव  का कार्य ही महिलायों को दिया जाता था| इसके अलावा देवदासी प्रथा का भी उल्लेख मिलता है I 

आधुनिक समय में महिलाओं  की स्तिथि में काफी सुधार आया है लेकिन कई स्थानों में उनका प्रवेश अभी भी  वर्जित है| इसके अलावा एक और मुद्दे पे प्रकाश डाला जाये तो भारतीय संस्कृति में महिला पुजारियों का उल्लेख नहीं मिलता|

इसी रूढ़िवादी परंपरा को तोड़ते हुए महिलायों को आगे आना पड़ेगा और महिलायों ने इसकी शुरआत कर भी दी है इसका उदहारण मिलता है पुणे के प्रदन्या  पाटिल के घर में जिन्होंने अपने घर की गृह प्रवेश पूजा एक महिला पुजारी के हाथों करवाई, इन  महिला पुजारी का नाम है चित्रा लेले I 41 वर्षीया चित्रा लेले अपने काम में बहुत दक्ष हैं I चित्रा लेले जैसी और भी महिलाएं हैं जो महिला पुजारी की भूमिका निभाना चाहती है और उनकी इस सपने को आकार दे रहा है पुणे का दयनप्रबोधिनि  सेंटर I ये केंद्र समाज की पुरानी परम्पराओं को तोड़ते हुए 1 साल का कोर्स चला रहा है जिसमे महिलाओं  को पुजारी बनने का कोर्स कराया जाता है और हिन्दू संस्कृति के 16 संस्कारों में दक्ष किया जाता है I  इसके साथ ही उन्हें संस्कृत भाषा का भी ज्ञान दिया जाता है और कुछ महिला पुजारी अंग्रेजी भाषा में भी यह काम करती हैं क्यूंकि उनके अनुसार संस्कृत का ज्ञान सबको नहीं होता है उनके ऐसा करने से उनके यजमानो को समझ आता है की पूजा विधि में कब, क्या और क्यों हो रहा है I 

इस तरह महिलाएं धीरे धीरे इन परम्पराओं को तोड़के खुद के लिए एक नई पहचान बना रही है जो कि स्वागत योग्य है I 

 

होकलवायर असाइनमेंट

    Similar News