जल जीवन और संकट

By: Deepa, 2016-04-14 11:30:00.0Category:  मुद्दे और चिंताएं
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जल ही जीवन है ये कहावत हम बचपन से पड़ते आ रहे है लेकिन आधुनिक युग की बात करें तो पल दूर नहीं जब जल जीवन लेने का सबसे बड़ा कारण बनेगा I इसका उदहारण हमे इस बात से पता चलता है की पानी के बटवारें की जो लड़ाई मोहल्लों में दिखाई देती थी वो अब अपनी सीमा लाँघ के राज्यों और देशों तक पहुँच गई है I यमुना के पानी को लेकर चाहे पंजाब,�दिल्ली या हरियाणा का झगड़ा हो या कावेरी के पानी को लेके कर्नाटक और तमिलनाडु की लड़ाई I महाराष्ट्र के लातूर जिले में तो 31 मई तक धारा 144 लगा दी गई है�अर्थात�अब एक साथ 5 लोगों से ज्यादा लोग किसी कुएं पास खड़े नहीं मिलेंगे क्यूंकि ये आशंका है की वह जो पानी की किल्लत है उसके चलते कोई दंगा न हो जाये I�

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प्राचीन समय में�हमारी लगभग सारी सभ्यताएं नदियों के किनारे ही बसी और फली फूलीं|�उदहारण के लिए �"सिंधु घाटी सभ्यता " विश्व की प्राचीन नदी घाटी सभ्यताओं में से एक प्रमुख सभ्यता थी। यह हड़प्पा सभ्यता और सिंधु-सरस्वती सभ्यता के नाम से भी जानी जाती है। इसका विकास सिंधु और घघ्घर/हकड़ा (प्राचीन सरस्वती) के किनारे हुआ। इससे साबित होता है की जल का हमारे जीवन अत्यधिक महत्ता है I�

लेकिन धीरे धीरे पानी की मांग ज्यादा और पूर्ती कम होती जा रही है इसका महत्वपूर्ण कारण बढ़ती जनसँख्या और उद्योगों में होने वाली बढ़ोतरी है I 1951 में �पर कैपिटा पानी �की उपलब्धता �5177 मी 3. जो की 2011 में � घटकर 1545 मी 3 रह गई है I�

वर्ष�वाटर �डिमांड (बिलियन क्यूबिक मी.)
2000�634
20251093
20501447


�भारत,चीन, फ्रांस और अमेरिका में हुई अलग अलग केस स्टडी के अनुसार 2040 तक पीने के पानी की उपलब्धता न के बराबर रह जाएगी अगर�हमने अभी कुछ नहीं किया तोI

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जल संकट के कारणों पर नज़र डाले तो उनमे प्रमुख कारण हैं -

  1. जल संसाधनों का ठीक से नियमन ना कर पाना I�
  2. खेती के लिए सदियों पुराने तरीकों का इस्तेमाल जिसमे पानी की खपत बहुत ज्यादा होती है इसकी जगह हमे नए तरीकों का उपयोग करना होगा जैसे माइक्रो इरीगेशन के ड्रिप और स्प्रिंकल विधि ये �सिंचाई की एक विशेष विधि है जिसमें पानी और खाद की बचत होती है। इस विधि में पानी को पौधों की जड़ों पर बूँद-बूंद करके टपकाया जाता है। इस कार्य के लिए वाल्व, पाइप, नलियों तथा एमिटर का नेटवर्क लगाना पड़ता है। इसे 'टपक सिंचाई' या 'बूँद-बूँद सिंचाई' भी कहते हैं।
  3. दिन पे दिन होने वाले निर्माण कार्यों ने पारपरिक जल निकायों की अवहेलना की है जो की एक महतवपूर्ण जल संचयन का काम करते है ई
  4. साफ़ पानी की अनुपलब्धता भी एक बड़ी समस्या है कारण� ये है की हम कारखानों�व�घरों से निकली गन्दगी जो की सीवेज से सीधे नदियों में गिरा दी जाती है I �
  5. �भारत कई नदियों का जल पीने योग्य नहीं है लेकिन सरकार urban water-treatment पे कोई ध्यान नहीं देती है I�
  6. हर घर पे वर्षा जल के संचयन का होना चाहिए परन्तु ऐसा नहीं है वर्षा का अनमोल जल नदी नालों में बह जाता है I�
  7. बिजली के निर्माण में भी हज़ारों ली. पानी के जरूरत संयंत्रों को ठंडा करना पड़ता है I थर्मल पावर प्लांट इत्यादि में प्रयोग होने वाली जल की मात्र 2050 कई गुना होने की आशंका है I�
  8. इसके अलावा हमे घरेलु स्तर पर भी जल संचयन का प्रयास करना पड़ेगा, किसी सार्वजानिक जगह पे बूँद बूँद टपकते हुए जल से लगभग 2 ,26 ,800 ली. पानी का नुकसान होता है इसलिए हमे व्यक्तिगत स्तर पर भी पानी को बचाना चाहिए I�
  9. बांधों का निर्माण भी पर्यावरणविदों को ज्यादा नहीं लुभा पा रही है I �यूनाइटेड �नशंस �एनवायरनमेंट �प्रोग्राम 2001 के अनुसार बांधो का निर्माण जिस उद्द्देश्य से किया गया था वो उसमे असफल हुए हैं क्यूंकि बांधों के निर्माण से पानी इकठा होता ह वो पीने योग्य नहीं रह जाता है क्यूंकि उसमे काफी गंदगी आ जाती है I और पानी की उपलब्ध्ता काम हो जाती है I और गर्मी आते ही इन बांधों का पानी भी सूख जाता है I बांधो का निर्माण निर्माण नदियों के पारिस्थिक तंत्र को प्रभावित कर रहा है I ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार गुजरात की तस्वीर को काफी बदसूरत घोषित �कर दिए है यहां 8 जिलों और 1000 गावों को जल के मामले में संकटग्रस्त घोषित कर दिया गया है I �ये तो �सिर्फ गुजरात की स्तिथि है देश के कई राज्यों में ये संकट दिन पे दिन गहराता जा रहा है I�

सरकार के साथ हमे भी व्यक्तिगत स्तर पे जल का संरक्षण और संचयन करना पड़ेगा अन्यथा आने वाली पीढ़ी बूँद बूँद पानी को तरसेगी जिसके लिए हम ही ज़िम्मेदार होंगे I�

होकलवायर असाइनमेंट

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