आरक्षण एक अभिशाप. 230 पर फेल औ 195 पास : सिविल सर्विसेज

By: Deepa, 2016-05-18 15:45:00.0Category:  मुद्दे और चिंताएं
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आरक्षण एक ऐसा विषय जिसपर समय समय पर बहस होती रहती है कि आरक्षण का होना क्यों जरूरी है और समाज में कौन से लोग आरक्षण पाने योग्य है और आरक्षण का आधार क्या होना चाहिए ? क्या जातिगत आधार सही है या आर्थिक आधार सही है ?
 

इसी व्यवस्था के शिकार हुए हैं अंकित श्रीवास्तव  जिन्हे सिविल सर्विस प्राम्भिक परीक्षा 2015 में  230 .76   नंबर मिले जबकि इस बार कि टोपर टीना दाबी को 195.39  नंबर मिले | ज्यादा नंबर पाकर भी समाज में फैले आरक्षण कि बीमारी कि वजह से वो आगे नहीं बढ़ पाये और आरक्षण के पंख लगा के टीना टॉपर बन गई | अंकित ने एक फेसबुक पोस्ट में अपनी कहानी कुछ इस तरह बयां की -

“अभी अचानक पढाई करते-२ एकदम से मन हुआ की किताबो को आग लगा के परिवार समेत इस अंदर तक सड़ चुके देश को छोड़ कर हमेशा-2 के लिए विदेश भाग जाऊं और वहीँ सुकून से नौकरी करूँ। अचानक ऐसे ख्याल आने का कारण पढाई से मन उचटना या बोर हो जाना कतई नहीं था, दरसल अभी युँ ही बैठे-2 UPSC की वेबसइट पर अपने पिछले साल के असफल प्रयास की मार्कशीट निहार रहा था….तभी जाने कहा से ख्याल आया की लाओ इस वर्ष की टॉपर टीना डाबी की मार्कशीट भी देखी जाये। बस फिर क्या था फटाफट रोल नंबर गूगल किया और मैडम की भी मार्कशीट खोल डाली और उसके बाद जो सामने दिखा वो ही शायद मेरी इस घनघोर निराशा और गुस्से का कारण बना। मेरे आश्चर्य की इंतहा नहीं रही जब मैंने देखा की मैडम का CSP 2015 स्कोर है 96.66 और मेरा अर्थात अंकित श्रीवास्तव का स्कोर है 103.5, इतना ही नहीं पेपर 2 में मेरे 127.5 अंक है और माननीय टॉपर महोदया के 98.7 (दोनों मार्कशीट्स का स्क्रीनशॉट इस पोस्ट में है, और उसे UPSC की वेबसाइट पे रोल नंबर्स की सहायता से जांचा भी जा सकता है) अर्थात मैंने CSP -2015 में टॉपर महोदया से 35 अंक ज्यादा प्राप्त किये हैं। आरक्षण-व्यवस्था की महिमा कितनी चमत्कारिक है, सच्चे अर्थों में आज इसका एहसास हुआ। याद रहे की ऐसा भी बिलकुल नहीं है की टीना डाबी समाज के वंचित तबके से सम्बन्ध रखती हैं। उनके माता और पिता दोनों इंजीनियरिंग सेवा के अधिकारी रहे हैं और वह भी हम जैसो की तरह एक खाते-पीते संपन्न मध्यम-वर्ग से आती हैं? ऐसे में बड़ा प्रश्न यह उठता है की क्या इसी प्रकार के सामजिक न्याय की अवधारणा पर इस देश का निर्माण हुआ है? मैं अपनी संभावनाओं में जरुरी सुधार कर आईएस बन सकूँ या ना बन सकूँ, पर क्या हमारी दिशा और दशा सही है? क्या हमारी वर्तमान चयन-प्रक्रियाएं आज सर्वश्रेष्ठ को चुनने की क्षमता रखती हैं? टीना डाबी सिर्फ एक उदाहरण हैं, उन्होंने जो किया है उसके लिए उनके प्रयासों की जितनी भी प्रशंसा की जाये वो निःसन्देह कम है, यहाँ उद्देश उन्हें या उनकी उपलब्धियों को कमतर आंकना कतई नहीं है, और न ही अपनी कुंठा तुष्ट करना है । परन्तु एक प्रश्न यह भी निसंदेह उतना ही महत्वपूर्ण है की मेरे जैसे सैकड़ो निहायत ही क्षमतावान और समर्पित नौजवान, जो अपनी बड़ी-2 नौकरियां ठुकरा कर अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण दिनों के रोज 12-14 घंटे सिर्फ पढाई करते हैं, वो आज किसके द्वारा किये गए अन्यायों का दंश झेल रहे हैं? क्या आरक्षण व्यवस्था का पुनरावलोकन करने और उसे वर्तमान जातिगत व्यवस्था से अलग कर ‘वास्तविक आर्थिक और सामजिक पिछड़ेपन’ से सम्बद्ध करने का राजनैतिक साहस किसी में नहीं है? दुःखद, हमसे ज्यादा इस देश के लिए दुर्भागयपूर्ण है ये स्थिति!”

संविधान निर्माताऔं ने पिछड़ों को अगड़ों के समकक्ष लाने के लिए दस वर्ष तक आरक्षण का प्रावधान किया था, जिसे दस-दस वर्ष तक बढ़ाने के बाद अब उसे अनंत कल तक बनाए रखने की व्यवस्था चल रही है, और ऐसा नेता लोग अपनी  राजनीति कि दुकान को हमेशा चमकाए रखने के लिए करते हैं ?संविधान के अनुच्छेद 15(1), 16(1), और 29(3) में स्पष्ट शब्दों में सरकारी सेवाओं और शिक्षा संस्थाओं में जाति को आधार बनाने से वर्जित किया गया है । ऐसा कई बार होता है कि आरक्षण कि वजह से क्रीमी लेयर के लोग आर्थिक रूप से सशक्त होते हुए भी आगे बाद जाते हैं और आर्थिक रूप से कमजोर जनरल  वर्ग के लोग पीछे रह जाते है साथ ही कम नंबर पाकर आरक्षित वर्ग के लोग नौकरी पा जाते हैं और अधिक नंबर पाकर जनरल वर्ग के लोग पीछे | 

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